कविता- मेरे दोस्त मेरे यार

Poem- Mere Dost Mere Yaar
कविता- मेरे दोस्त मेरे यार

मेरे दोस्त मेरे यार क्या मुझसे कोई खता हुई
हां शायद कभी तेरे लबों से ये सुखदाई मुस्कान जुदा हुई
ठीक है खता की है मैंने यह मान लेता हूं
अपने अंदर बैठे उस दोष को पहचान लेता हूं

पर यार रूठने जैसी इतनी बड़ी सजा तो ना देते
हमें नाज है तू जैसे यार पर, जरा इतना तो जान लेते
तू मुझसे क्या रुठा,
मानव जन्नत भी जहन्नम बन गई
खुशियों के बादल भी गम की बरसात करने लगे हैं
मेरी रूह के कतरे  तुझसे बात करने लगे हैं

यार आंखों में मोहब्बत ना दिखी, तो कोई बात नहीं
अगर मेरे दिल से तो पूछ लेते
मेरा हमसफ़र कौन है?
बेशक तुम्हारा ही नाम लेता मैं
तेरे रूठने के बाद का हाल-ए-दिल अब और खुलकर बयां करता हूं
किस्मत को नहीं ,मैं तो खुद को ही दोष दिया करता हूं

गुलाबो का शहर मेरा इस कदर तबाह हो गया
तन्हाइयों ने डेरा डाल लिया और हर गम में कांटे बिछा दिए
तेरी जुदाई के दर्द को बड़े नाजो से पाला है मेरे अश्कों  ने
सच कहता हूं जब भी मिलेंगे इस दिल की गलतफहमियां दूर हो जाएंगी
खुशियां लौट आने पर मजबूर हो जाएंगी
बेवफाई का जनाजा  उठाएगा 
हर बेवफा इंसान भी
इस कदर मोहब्बत की कदर की जाएगी|

- कवि  राहुल जांगिड़

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